भारत और मिस्र: द्विपक्षीय रक्षा सहयोग

पाठ्यक्रम: GS2/अंतर्राष्ट्रीय संबंध

संदर्भ

  • हाल ही में 11वीं भारत–मिस्र संयुक्त रक्षा समिति (JDC) की बैठक काहिरा में आयोजित हुई। यह बैठक रणनीतिक साझेदारी (2023) और रक्षा सहयोग पर समझौता ज्ञापन (2022) के अंतर्गत द्विपक्षीय रक्षा संबंधों को सुदृढ़ करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम रही।

भारत–मिस्र संबंधों के बारे में

  • प्राचीन एवं मध्यकालीन संबंध: सिंधु घाटी और नील सभ्यता के बीच लाल सागर मार्गों से व्यापारिक संबंध।
    • ग्रीको-रोमन और बाद में इस्लामी नेटवर्क के माध्यम से सांस्कृतिक आदान-प्रदान।
  • स्वतंत्रता-उपरांत चरण: नेहरू–नासिर नेतृत्व के अंतर्गत मजबूत संबंध।
    • गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM) के संस्थापक सदस्य।
    • स्वेज संकट (1956) के दौरान सहयोग, भारत ने मिस्र की संप्रभुता का समर्थन किया।
    • उपनिवेशवाद-विरोध और दक्षिण-दक्षिण सहयोग की साझा दृष्टि।
  • शीत युद्ध से उत्तर-शीत युद्ध काल तक: बदलती भू-राजनीतिक प्राथमिकताओं के कारण संबंध धीमे पड़े।
    • 1990 के दशक से आर्थिक उदारीकरण के साथ पुनः सक्रियता।

वर्तमान स्थिति

  • राजनीतिक एवं रणनीतिक: संबंधों को रणनीतिक साझेदारी (2023) तक उन्नत किया गया।
    • नियमित उच्च-स्तरीय यात्राएँ; मिस्र को गणतंत्र दिवस 2023 में मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया।
    • बहुपक्षीय मंचों (UN, BRICS विस्तार) में सहयोग।
  • आर्थिक संबंध: द्विपक्षीय व्यापार लगभग 6–7 अरब डॉलर
    • प्रमुख क्षेत्र: पेट्रोलियम, उर्वरक, वस्त्र।
    • भारतीय निवेश: फार्मा, आईटी, विनिर्माण।
  • समुद्री एवं भू-रणनीतिक महत्व: मिस्र का स्वेज नहर पर नियंत्रण, जो भारत के व्यापार के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
    • हिंद महासागर और भूमध्यसागर में संपर्क का अभिसरण।
    • भारत की भूमिका: हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) में शुद्ध सुरक्षा प्रदाता।
  • रक्षा सहयोग: संस्थागत तंत्र: संयुक्त रक्षा समिति (JDC)
    • प्रमुख क्षेत्र: संयुक्त अभ्यास एवं प्रशिक्षण, रक्षा उत्पादन एवं तकनीक, समुद्री सुरक्षा सहयोग।
    • अभ्यास साइक्लोन – भारतीय सेना (पैरा स्पेशल फोर्सेज) और मिस्र की विशेष बलों के बीच संयुक्त विशेष बल अभ्यास।
      • फोकस: आतंकवाद-रोधी अभियान, रेगिस्तानी युद्ध, शहरी युद्ध रणनीति, विशेष अभियानों का समन्वय।

11वीं संयुक्त रक्षा समिति (JDC) के प्रमुख परिणाम

  • भविष्य उन्मुख रक्षा रोडमैप (2026–27): सैन्य-से-सैन्य सहभागिता का विस्तार।
    • संयुक्त प्रशिक्षण अभ्यासों की तीव्रता।
    • समुद्री सुरक्षा सहयोग को बढ़ावा।
    • सैन्य अभ्यासों का पैमाना और जटिलता बढ़ाना।
    • रक्षा उत्पादन और तकनीकी सहयोग को सुदृढ़ करना।
  • रक्षा उद्योग सहयोग: भारत ने अपने रक्षा उत्पादन में वृद्धि को रेखांकित किया (20 अरब डॉलर से अधिक उत्पादन, लगभग 4 अरब डॉलर निर्यात 100+ देशों को)।
    • रक्षा उद्योग सहयोग योजना विकसित करने पर सहमति।
    • प्रमुख क्षेत्र: सह-विकास और सह-उत्पादन, तकनीक हस्तांतरण, औद्योगिक साझेदारी।
    • यह भारत की आत्मनिर्भर भारत पहल और निर्यात-आधारित विकास को दर्शाता है।
  • समुद्री सुरक्षा सहयोग: प्रथम बार नौसेना-से-नौसेना स्टाफ वार्ता आयोजित।
    • भारत ने हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) में नौवहन स्वतंत्रता सुनिश्चित करने और IFC-IOR के योगदान पर बल दिया।
    • समुद्री सहयोग भारत की रणनीतिक पहुँच का केंद्र है, विशेषकर SLOCs की सुरक्षा और उभरते खतरों का मुकाबला करने में।
    • यह भारत की SAGAR (सिक्योरिटी एंड ग्रोथ फॉर ऑल इन द रीजन) दृष्टि के अनुरूप है।
  • वायुसेना सहयोग: मिस्र वायुसेना प्रमुख से बैठक।
    • वायु-से-वायु सहयोग की बढ़ती संभावनाओं को मान्यता।
    • संयुक्त अभ्यास और प्रशिक्षण आदान-प्रदान की संभावना।

संबंधित मुद्दे एवं चिंताएँ

  • व्यापार असंतुलन और अप्रयुक्त आर्थिक क्षमता।
  • सीमित निजी क्षेत्र की भागीदारी।
  • नौकरशाही एवं नियामक बाधाएँ।
  • मिस्र/अफ्रीका में चीन और अन्य वैश्विक खिलाड़ियों से प्रतिस्पर्धा।
  • पश्चिम एशिया–उत्तर अफ्रीका (WANA) क्षेत्र में अस्थिरता, जहाँ मिस्र एक प्रमुख खिलाड़ी है।

भविष्य की राह

  • आर्थिक एवं संपर्क:CEPA/FTA संभावनाओं के माध्यम से व्यापार विस्तार।
    • मिस्र को अफ्रीका और यूरोप के लिए प्रवेश द्वार के रूप में उपयोग।
  • रक्षा एवं सुरक्षा: सह-उत्पादन और रक्षा निर्यात को बढ़ावा।
    • समुद्री सुरक्षा सहयोग को सुदृढ़ करना (स्वेज–IOR संपर्क)।
  • ऊर्जा एवं तकनीक: हरित हाइड्रोजन, नवीकरणीय ऊर्जा और डिजिटल अवसंरचना में सहयोग।
  • बहुपक्षीय सहयोग: ग्लोबल साउथ प्लेटफ़ॉर्म, जलवायु वार्ता और आतंकवाद-रोधी ढाँचों में संयुक्त नेतृत्व।

निष्कर्ष एवं आगे की राह

  • भारत–मिस्र संबंध ऐतिहासिक सद्भावना से रणनीतिक गहराई की ओर संक्रमण कर रहे हैं।
  • यह साझेदारी भारत की पश्चिम एशिया–अफ्रीका नीति और ग्लोबल साउथ कूटनीति को आकार देने की क्षमता रखती है, जिसमें भूगोल, अर्थव्यवस्था एवं सुरक्षा में परस्पर पूरकता है।
  • आवश्यक है कि रक्षा उद्योग सहयोग योजनाओं को क्रियान्वित किया जाए, त्रि-सेवा सहभागिता का विस्तार हो, खुफिया साझेदारी एवं आतंकवाद-रोधी सहयोग को बढ़ावा मिले, और बहुपक्षीय समुद्री ढाँचों को सुदृढ़ किया जाए।

स्रोत: TH

 

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